वाल्मीकि जयंती 2020: जानिए इतिहास और महत्व, क्या है पूजा का समय?

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आज पूरा देश वाल्मीकि जयंती मनाने की तैयारियों में लगा हुआ है। भारतीय संस्कृति में महर्षि वाल्मीकि का काफी महत्व माना जाता है। धारणा के अनुसार इन्होंने रामायण लिखते वक्त चेन्नई में तिरुवनमियूर मंदिर में विश्राम किया था। साथ ही लोगों की मान्यता के अनुसार यह मंदिर 1300 साल पुराना है। आज के दिन वाल्मीकि मंदिरों में रामायण से जुड़े लोगों का पाठ किया जाता है। 

पूजा की समय-तिथि

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  • पूर्णिमा तिथि आरंभ: 30 अक्टूबर शाम 5:45 से
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 31 अक्टूबर रात 8:21 पर

कैसे मनाया जाता है? 

लेखक और महर्षि वाल्मीकि की जयंती अश्विन माह की पूर्णिमा को मनाई जाती है। मंदिरों में रामायण के श्लोकों का पाठ होता है और साथ ही वाल्मीकि संप्रदाय के अनुयायी शोभायात्रा भी निकालते हैं। इसमें वे सभी भक्ति गीत और भजन का गायन करते हैं। इस साल कोरोनावायरस की वजह से यह शोभायात्रा बड़े स्तर पर निकलने की संभावना कम है।

मंदिरों में होगा दीपदान

वाल्मीकि जयंती पर अखंड मानस पाठ के आयोजन के साथ-साथ आज के दिन मंदिरों में दीपदान भी किया जाएगा। इस को ध्यान में रखते हुए कई जिले तहसील और ब्लॉक स्तर पर समितियों का गठन हुआ है। यह दीपदान मंदिरों और वाल्मीकि से संबंधित स्थलों पर किया जाएगा। 

कौन हैं वाल्मीकि?

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महर्षि वाल्मीकि रामायण के रचयिता हैं जिनका जन्म अश्विन मास की पूर्णिमा के दिन हुआ था। इन्हें ‘आदि कवि’ के रूप में भी जाना जाता है। संस्कृत साहित्य में महर्षि वाल्मीकि पहले कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

वाल्मीकि नाम क्यों पड़ा?

कहा जाता है कि एक बार महर्षि वाल्मीकि ध्यान कर रहे थे, उसी वक्त उनके शरीर पर दीमक चल गई थी। उनकी साधना पूर्ण होने के बाद उन्होंने उससे हटाया था। वाल्मीकि दीमकों के घर को कहा जाता है। ऐसे में इन्हें भी वाल्मीकि पुकारा गया और यह रत्नाकर नाम से भी जाने जाते हैं।

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