Pop Culture Hub

Web Shows

फ़िल्म रिव्यु :- मनोज बाजपेयी की ‘भोंसले’ फ़िल्म न देखने वाले बॉलीवुड को गालियाँ देने का हक़ नहीं रखते !

-Mohit Dixit

महाराष्ट्र सिर्फ मराठी मानुष का है।”  फ़िल्म भोंसले का यह डायलॉग ही फ़िल्म के प्लॉट को बता देता है। यह फ़िल्म महाराष्ट्र में घटित एक चॉल की कहानी है। मगर इस फ़िल्म में इतनी ताकत है कि यह महज एक चॉल की कहानी नहीं रह जाती। महाराष्ट्र में नार्थ इंडियंस ( उत्तर प्रदेश एवं बिहार ) के साथ होते भेदभाव से पूरा देश वाकिफ है। इसी बात पर तंज कसती यह फ़िल्म समाज पर गहरी चोट है। 
यूँ तो मनोज बाजपाई का नाम सुनते ही उनका सरदार खान वाला रूप याद आता है मगर यहाँ मनोज 60 साल के ‘गणपतराव भोंसले’ के किरदार में हैं। जो बिना ज्यादा कुछ बोले अपने एक्सप्रेशन और किरदार की डिटेलिंग के दम पर आपका दिल जीत लेते हैं। भोंसले अब पुलिस कांस्टेबल की जॉब से रिटायर हो चुके हैं और अपनी जॉब एक्सटेंड कराने को संघर्ष करते रहते हैं। 

फ़िल्म का दूसरा मुख्य किरदार विलास का है जो संतोष जुवेकर ने निभाया है। वह एक टैक्सी ड्राइवर हैं और राजनीति में अपना हाथ आज़माना चाहते हैं। महाराष्ट्र पर सिर्फ मराठी मानुस का हक़ है ‘विलास’ इस बात के धुर-समर्थक हैं। संतोष का किरदार हल्का – सा नेगेटिव है मगर उनकी एक्टिंग देख उनकी काबिलियत का पता चलता है। कभी झिझक कभी गुस्सा कभी नार्थ इंडियंस पर बर्बरता करना, हर एक सीन में उनका एक्सप्रेशन कमाल का लगता है। इन दोनों किरदारों के अलावा इप्सिता चक्रबर्ती ‘सीता’ नाम की एक बिहारी नर्स के किरदार में हैं। उनका एक छोटा भाई भी है जिसके साथ वह बिहार से मुंबई रहने आती है। इस किरदार को ‘विराट वैभव‘ ने निभाया है। कैमियो में अभिषेक बनर्जी  एक बिहारी बने नज़र आते हैं और वह मराठियों के खिलाफ एक नार्थ इंडियन संघ बनाने में जुटे हैं। 

इन सभी किरदारों को जीवंत बनाने में जितना हाथ कलाकारों का है उतना ही पर्दे के पीछे रहने वाले लेखक, निर्देशक, सिनेमेटोग्राफर, और अन्य प्रोडक्शन यूनिट का है। फ़िल्म की डिटेलिंग ही उसे बाकी फिल्मों से अलग बना देती है। जैसे एक सीन है जब भोंसले विलास को थप्पड़ मारता है तब जैसे जैसे भोंसले विलास के करीब जाता है वैसे वैसे उसके हाथ के हिलते हुए अंगूठे को दिखाना थप्पड़ पड़ने का अंदेशा दर्शकों को दे देता है। यह बेहतरीन कैमरा वर्क का ही एक नमूना है। फ़िल्म में एक भी गाना नहीं है मगर फ़िल्म के साथ साथ चलता  बैकग्राउंड स्कोर सीधे दिल में उतरने वाला है। इसके अलावा गणपतराव भोंसले और भगवान गणेश की मूर्ति के बीच फ़िल्म के आगाज़ और अंत में जो मेल दिखाया गया है वह भी कमाल की क्रिएटिविटी दर्शाता है। 

निर्देशक देवाशीष मखिझा की यह फ़िल्म यूँ तो साल 2018 में ही रिलीज हो गयी थी मगर तब यह फ़िल्म सिर्फ फिल्म फेस्टिवल्स का हिस्सा बनी थी, थिएटर में इसे रिलीज नहीं किया गया था। इसकी भी वजह है और वह यह कि थिएटर में लोग कमर्शियल सिनेमा ज्यादा पसंद करते हैं और यह एक आर्ट फ़िल्म है। माईने साफ हैं कि ताली मारने और सीटी बजाने वाले डायलॉग और सिनेमाई पर्दे पर मार धाड़ कर हीरो को मसीहा बनाकर पेश करना इस फ़िल्म में आपको नहीं मिलेगा।
‘भोंसले’ फ़िल्म को न देख कर नज़रअंदाज़ करना सिनेमाप्रेमियों का ही दुर्भाग्य होगा। हाल ही में इसे सोनी लिव ऐप पर रिलीज किया गया। आप इसे पूरे परिवार के साथ देख सकते हैं मगर फ़िल्म की शुरुआती रफ्तार धीमी है या यूँ कहें कि आर्ट फिल्मों की रफ्तार धीमी ही होती है। तो कमर्शियल सिनेमा पसन्द करने वाले लोगों को उबाई जरूर आ सकती है। उसी प्रकार जैसे ऑस्कर जीतने वाली पैरासाइट देखते हुए बाहुबली के डायरेक्टर सो गए थे। 
Available – Sony Liv 
Rating – 4/5
_______________________________________
Follow Filmybaapofficial on Instagram, facebook & twitter for more such stuff. 

LEAVE A RESPONSE

Your email address will not be published. Required fields are marked *

DMCA.com Protection Status