क्या फेसबुक और ट्विटर का प्रयोग सुरक्षित है? एक शोध में पाए गए चौंकाने वाले तथ्य….

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फ़ेसबुक पर 2019 में लोगों के डाटा के असुरक्षित होने और उसका किसी खास राजनैतिक दल की ओर झुकाव पैदा करने के इल्जाम साबित हुए थे। जिसके बाद कंपनी को एफ टी सी ( फेडरल ट्रेड कमीशन) को 5 बिलियन डॉलर का भारी भुगतान करना पड़ा है। ट्विटर पर आए दिन ट्रेंड होने वाले हैशटैग पर, किसी एक विचारधारा का होना साफ नजर आता है। ऐसे में विरोधी विचारों का टकराव और उससे पैदा होता रोष आए दिन नई दुर्घटनाओं को जन्म दे रहा है। काफी बड़े स्तर पर इससे राजनैतिक दलों का फायदा होता है और बहुत आसानी से ध्रुवीकरण किया जाता है। 

गेब एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म है, जिसपर दक्षिणपंथी होने के इल्ज़ाम हैं, जिसके चलते प्लेस्टोर और एप्पल ऐप स्टोर से भी इसे हटा दिया है। 2018  में छिड़े विवाद के बाद इस एप्लिकेशन के जनता के बीच पहुंचते ही ऐसा किया जाता है, हालांकि इसके पीछे का कारण हेट स्पीच को भी माना जाता है। हाल ही इसके सीईओ एंड्रयू  ट्रोड ने एक रिसर्च साझा किया है, जो कि इटली की तीन यूनिवर्सिटी ने साथ मिलकर 1 मिलियन (दस लाख) लोगों की ऑनलाइन गतिविधि को देखने के बाद रिजल्ट पाए हैं। जिसमें अमेरिकी जनता और वहां पर फैले ट्रेंडिंग विषयों को ध्यान में रखकर रिसर्च की गई है। चार अलग अलग प्लेटफॉर्म, फेसबुक, ट्विटर, रेडिट और गैब को ध्यान में रखकर।
फेसबुक और ट्विटर की एल्गोरिथम इको चैंबर तैयार करने में सबसे सक्षम पाए गए हैं। हालांकि गैब अपने आप में दक्षिणपंथी रहा है, वहीं रेडिट काफी हद तक अछूता है। ऐसी स्थिति में देखा गया है कि फेसबुक और ट्विटर पर बढ़ती फेक न्यूज और हेट स्पीच को रोकना और भी कठिन होता जा रहा है। कई घटनाओं में मुख्य रूप से भीड़ इकट्ठा करना और भड़काने का काम, ऐसे हीं प्लेटफॉर्म पर लगातार की जाने वाली पोस्ट का नतीजा है। खासकर युवा वर्ग पर इसका बहुत बुरा प्रभाव है।

फेसबुक और ट्विटर पर बने इको चैंबरों के बदौलत कई सारे मुद्दों को दबा दिया जाता है, या मुख्य धारा तक खबरों को पहुंचने नहीं दिया जाता। ऐसा ही कई समाचार एजेंसी भी कर रही हैं, निजी विचारधारा को लोगों को स्वाभाविक रूप से स्वीकृति दिलवाने के लिए, इनके प्रयास जड़ तक पहुंच चुके हैं। लगातार किसी खास समाचार पर और एक जैसे शब्दों का प्रयोग कर लोगों को एक विचारधारा तक पहुंचा दिया जाता है। Mediabiascheck.org वेबसाइट की रिपोर्ट में न्यू यॉर्क टाइम्स का वामपंथी होने का दावा किया है, ऐसे अन्य कई समाचार पत्र भी हैं। एक जैसी खबरों का मानसिक स्तर पर गहरा असर होता है, जिसके कारण  हेट क्राइम और मोब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। अराजकता को बढ़ाने के लिए युवाओं को एकजुट करना और ज़मीनी मुद्दों से इतर राजनैतिक मुद्दों पर अधिक से अधिक आंदोलन करवाए जाते हैं। 

ऐसे समय में सोशल मीडिया के प्रयोग को लेकर लोगों में ज़मीनी स्तर तक जागरूक करने कि आवश्यकता है और इन प्लेटफॉर्म पर और भी कड़े नियमों को लगाना ज़रूरी है। 
अमेरिका में सबसे अधिक लेफ्ट सेंटर को समर्थन देने वाले अखबार हैं, वहीं इनमें ज़्यादातर भरोसेमंद और बड़े नाम आते हैं। इन सभी बातों का प्रभाव भारत में और भी अधिक देखा गया है। 

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